
श्रावणी सम्राट को दूर जाते हुए लगातार टकटकी लगाए देखती रही। सम्राट के कहे हुए वो आख़िरी शब्द, 'अपनी इस शादी का असली सच जानना चाहती हो तो...', उसके कानों में बार-बार गूँज रहे थे। वह बुरी तरह से उलझ चुकी थी। उसका दिमाग़ समझ नहीं पा रहा था कि सम्राट किस सच की बात कर रहा है। वह उल्टे कदमों से वापस उसी बेंच की तरफ बढ़ी और जाकर बैठ गई।
बैठते ही उसका दिमाग़ किसी पुरानी फिल्म की रील की तरह सम्राट की कही हुई एक-एक बात उसके दिमाग में लगातार चलाने लगा। 'तुम वर्जिन तो होगी ही... कल जुहू बीच आ जाना... तुम्हें ऐसा डेंजर वाला गिफ्ट दूँगा जो तुम कभी भूल नहीं पाओगी... तुम खुद मेरी हो जाओगी।' ये सारे डायलॉग्स उसके सिर में किसी तूफ़ान की तरह आ जा रहे थे और उसका दम खुली हवा में घुटने लगा था।







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